2015
फ़रक्का एक्सप्रेस आ गई दिल्ली शहर सुबह सात बजे। दिल्ली मेरे लिए मेरी स्वप्न नगरी थी, जैसे आम लोगों की मुंबई होती है। इस ट्रेन सफ़र में मेरे साथी थे मेरे दो जिगरी यार रोहन और इरफ़ान। इरफ़ान ने टिकट कराई थी और लखनऊ से हमारी ट्रेन चली। मैंने अपने तीन साल लखनऊ से बनारस सिर्फ वरुणा एक्सप्रेस की जनरल बोगी में काट दिए और ये इसलिए क्यूंकि ना तो मुझे टिकट कराना आता था और ना ही मुझे सीखने का कोई शौक था। लखनऊ में ग्रेजुएशन हो गया था हम तीनों का, रोहन और मैं साथ में लखनऊ विश्वविद्यालय में थे और इरफ़ान मियां दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र थे।
रोहन को आगे M.C.A करना था, और उसके लिए कोचिंग की ज़रूरत थी जो कि मिलती दिल्ली में और वो कभी पहले दूसरे शहर में रहा नहीं था तो उसने अपने घर पर लोगों को बड़ी मशक्कत से इसके लिए मनाया और काफ़ी ना नुकुर के बाद आख़िरकार वो मान ही गए। मेरे घर पे भी पूछा गया के किस लिए दिल्ली जाना है? अभी तो लखनऊ से वापस आए हो, मेरे पास कोई पुख्ता जवाब था नहीं, क्योंकि मेरे दिमाग में सिर्फ एक चीज़ चलती थी और वो थी मेरी लिखाई। लिखने जा रहा हूं बोलना वो भी अपने पिताजी के सामने थोड़ा सा कठिन कार्य था पर मैंने वहीं बोला, और मुझे जाने दिया गया। अब आती है दिल्ली में रहेंगे कहा वाली बात, तो पहले तो ये तय हुआ था के मैं और रोहन एक साथ रहते, पर आखिरी मौके पे उसके घरवालों ने उसको उसके मामाजी के घर पर रहने को बोला। अब मैं पड़ गया अकेले, घर पे तो बोल चुका था के मैं और रोहन साथ रहेंगे, पर अब ये नई समस्या। फ़िर फोन लगाया इरफ़ान को, उसको ये समस्या बताई। वो दिल्ली में अपने 4 दोस्तो के साथ रहता था एक फ्लैट में, उसने तो बोल दिया के मेरे साथ रह लेना, कोई दिक्कत नहीं है, मैं बात कर लूंगा जिसका कमरा है उससे। ये सब जब घर पे बताया तो पिताजी उतने खुश नहीं थे इससे पर उन्होंने कुछ बोला नहीं। मैं इरफ़ान से रोज़ पूछता था फोन पर, के उसने बात करी या नहीं उस बन्दे से और वो बोलता के सब हो गया है तुम परेशान मत हो। ट्रेन में खाना खाते हुए भी इरफ़ान से मैंने पूछ लिया के कैसा है कमरा और मुझे किराया कितना देना होगा, तो वो अचानक से थोड़ा धीरे से बोलता है ,"अभी बात कर के बताऊंगा"। मैने पूछा के अब तक मेरे बारे में तुमने बताया नहीं क्या? जिसपे वो हल्के से हंसते हुए बोलता है, अरे यार सब बता दूंगा तू परेशान मत हो। मेरी तो जैसे हालत खराब हो गई के मैं जिसके भरोसे एक नए शहर में जा रहा हूं, उसने मेरे रहने के लिए बात तक नहीं करी अब तक और मैंने ट्रेन पकड़ ली इस पर भरोसा कर के। इरफ़ान और रोहन हंसने लगे और मुझे सांत्वना देने लगे के मुझे इतनी फिक्र नहीं करनी चाहिए, सब ठीक होगा और खाने में लग गए, पर मेरा ना तो अब खाने का मन था और ना ही मैं रात में सो पाया।
गाज़ियाबाद स्टेशन आया और ट्रेन में बातें होने लगीं के अब दिल्ली दूर नहीं। हमने चाय पी और क्या ज़बरदस्त चाय थी इस स्टेशन पे, मेरा तो दिल आ गया था, मैंने तो जैसे प्रण ले लिया के जब भी ट्रेन में चलेंगे गाज़ियाबाद पे चाय पीनी है। दिल्ली का निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन आ गया। रोहन को जाना था बदरपुर की अोर और उसको टैक्सी बहुत महंगी पड़ रही थी तो इरफ़ान ने उसको मेट्रो से जाने को बोला। ये मेट्रो भी मेरे लिए एक टेढ़ी खीर जैसा था, इरफ़ान ने रोहन को जो भी समझाया, मेरे एक अक्षर पल्ले ना पड़ा। रोहन तो निकल लिया और मैंने और इरफ़ान ने पकड़ ली एक टैक्सी रिठाला के लिए। दिल्ली की सुबह भा रही थी मुझे, एक अजीब सा डर भी लग रहा था, लखनऊ के मुकाबले ये शहर काफ़ी बड़ा लग रहा था और सड़कों पे भीड़ के तो क्या ही कहने। यहां बस सिर्फ स्टॉप पे रुकती थी, लखनऊ में तो जहां सवारी दिखी वहीं बस रुकी। आख़िरकार आ गए हम अपने आशियाने पे, मेरा मतलब है इरफ़ान साहब के आशियाने पे जो मेरा होगा या नहीं वो पता नहीं था। इलाका तो अच्छा था, सामने एक गुरुद्वारा था, मन में कड़े प्रसाद खाने के सपने भी देख लिए, परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, मेरा खाने से प्रेम कम नहीं हो सकता। इरफ़ान ने घंटी बजाई और एक आधे जगे, आधे सोए हरियाणवी लड़के ने दरवाज़ा खोला, इरफ़ान को गले से लगाया और मुझसे भी हंस कर हाथ मिलाया। उसका नाम था अमित। बाकी तीन सो रहे थे।
घर तो भाई अच्छा था, बिल्कुल एक घर जैसा, जिसमें मा बाप के साथ रहा जाता है और वो चार कॉलेज जाने वाले लड़कों का घर लगता नहीं था। अब इरफ़ान मियां ने ये बताया के जिसका ये घर उसका नाम स्वामी है और वो केरल का रहने वाला है। उसके मां बाप प्रोफ़ेसर हैं और केन्या में रिसर्च कर रहें है। उन्होंने स्वामी को बोल दिया था के अपने दोस्तों को इस घर में रख ले और जो वो किराया दें उससे अपना खर्चा चलाए। मैंने इरफ़ान से पूछा के वो मुझे रखने के बारे में स्वामी से कब पूछेगा? तो उसने बोला के स्वामी जैसे ही उठेगा वो उससे बात करेगा। मुझे अभी से अजीब लगने लगा था, ना जाने क्यूं मुझे लग रहा था के यहां अपना बसेरा नहीं है। मैं सोने चला गया और जब दो घंटे बाद उठा तो इरफ़ान वहां था नहीं। एक लकड़ा आया और उसने मुझे अन्दर वाले कमरे में आने को बोला और मैं आधी नींद में वहां पहुंचा। सबसे हाथ मिलाया और अपना नाम बताया। इन तीन लकड़ो में कोई भी उतना उत्साहित नहीं था मुझे देख कर और फिर मैं हमेशा की तरह मुद्दे पे आया और सीधा सवाल पूछा स्वामी से, "भाई, क्या मैं यहां रह सकता हूं? इरफ़ान ने तुमसे बात की होगी। स्वामी को हिंदी बोलना नहीं आता था पर वो समझता था, उसने बोला, "Bro, I am sorry but you cannot live here, I already have 4-5 boys here and my parents are not allowing me to add any more person. I hope you understand" मैंने बोला कोशिश कर लो शायद कुछ हो पाए, पर वो नहीं माना। मेरा दिल्ली में पहला दिन ही इतना ख़राब जाएगा, मुझे इसका अंदेशा नहीं था।
मैं काफ़ी परेशान हो गया था और परेशानी में सबको अपना घर याद आता है। मुझे भी आया, मैंने भारी मन से ही सही घर पे फ़ोन मिलता। पिताजी फ़ोन उठाते ही हाल चाल पूछते हैं, फ़िर मेरी थोड़ी परेशान आवाज़ सुनते ही समस्या पूछते हैं और झूठ मैैं पिताजी से बोलता नहीं तो मैंने सब बता दिया। मुझे इतना परेशान देखकर उन्होंने मुझे बोला के तुम्हें ज़्यादा दिक्कत है तो वापस आ जाओ, कोई बात नहीं है, पर मैंने भी कई चीज़ें सोची थी दिल्ली आने को ले कर, ऐसे जाने वालों में से नहीं था मैं। मैंने उनसे बोला के मैं देखता हूं कोई नया कमरा ढूंदूंगा, आप परेशान मत होइए। वो भावुक हो गए और ऐसा अक्सर होता नहीं हैं, मुझे बोलते हैं," बेटा, तुम परेशान हो तो मैं बिना चिंता के कैसे रह सकता हूं, तुम मज़बूत बनो, बाहर निकलो सब हो जाएगा"। वो शब्द मेरे अन्दर एक नई ऊर्जा ले आए और मैंने सोच लिया था के कल ही यहां से निकल कर कमरा ढूंढने निकलूंगा। इरफ़ान शाम को आया और मैंने उसको सारी बात बताई, वो थोड़ा शर्मिंदा था, मैंने उसको बोला के तुम्हें कुछ सोचने की ज़रूरत नहीं है, सिर्फ मेरे साथ चल कर कमरा ढूंढ लो, वो मान गया। इत्तेफ़ाकन अगले दिन मुझे मेरे एक जूनियर, नितिन जो के मेरे घर के सामने रहता था बनारस में मुझे फोन करता है और बोलता है के वो दिल्ली में है उसका दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन हो गया है और वो कमरा ढूंढ रहा है। मुझे तो ये सुनकर सिर्फ़ ये महसूस हुआ के कैसे भगवान ने एक रास्ता बंद किया और तुरंत दूसरा खोल दिया। मैंने नितिन से उसी वक़्त बोला के मुझे भी कमरे की ज़रूरत है तो वो बोलता है, "भैया मेरे साथ ही रह लीजिए", मैंने तुरंत हां कर दी। अब हमें जाना था, south-extension जहां नितिन मेरा इंतजार कर रहा था। मैं पहली बार दिल्ली मेट्रो में चढ़ा और मुझे उतना कुछ समझ नहीं आया के कौन सी लाइन कहा जाती हैं, पर को भी था, मेट्रो थी कमाल की चीज़। इरफ़ान ने पूरी गाथा बता दी दिल्ली मेट्रो की पर मेरा ध्यान सिर्फ़ उस नए कमरे पर था। आख़िरकार हम उतरे आई. एन. ए स्टेशन पर। नितिन इंतज़ार कर रहा था, उसके साथ था एक भारी भरकम हरियाणवी आदमी जो के ब्रोकर था। उसने बोला के ये फ्लैट नहीं है, लड़कों का हॉस्टल है, मुझे लगा ठीक होगा किराया मैं और नितिन बांट लेंगे, घर पे पैसे बचेंगे। पर मेरे अरमान टूटने वाले थे, ब्रोकर ने जब कमरा दिखाया तो मैं दंग रह गया, एक कुछ ज़्यादा ही छोटा कमरा जिसमें दो बेड पड़े थे और उसका किराया उसने बताया 5500 एक बेड का। ऐसा कमरा लखनऊ में 1500 रुपए में मिलता जिसमें दो बंदे रहते और महीने का 750 देते। उस ब्रोकर की बात वहीं खत्म नहीं हुई, उसने बोला के 1 महीने की सिक्योरिटी और ब्रोकेरेज चाहिए 2500 एक बंदे से। मैंने मन ही मन में जोड़ा और हिसाब आया 13,500 का, मेरी तो हालत ही ख़राब हो गई थी। लखनऊ में पढ़ाई के दौरान मैं एक राजा जैसे रहता था एक कमरा किराए पे ले कर और उसका किराया था सिर्फ़ 3500 और ना कोई सिक्योरिटी और ना ही कोई ब्रोकरेज। ये दिल्ली शहर ने मुझे दो दिन में नानी याद दिला दी। इरफ़ान ने मुझे सलाह दी के भाई इसको ले लो, जल्दी मिलेगा नहीं दिल्ली में कुछ और। मन तो किया के उसको एक थप्पड़ लगा दूं, क्योंकि मेरी इस परेशानी का सबसे बड़ा कारण वहीं था। नितिन को भी तुरंत कमरा चाहिए था और वो भी यहां रहने के इक्छुक था।अब मरता क्या ना करता मैंने तुरंत पिताजी को फोन मिलाया और सब उनको बताया, वो जानते थे मैं बहुत परेशान हूं, उन्होंने तुरंत कमरा लेने को हां कह दिया। मैंने ब्रोकर को बोला के हम कल आएंगे और फ़िर निकल लिए अपने अपने रास्ते। आस पास का इलाका ग़ज़ब का था, पर उस इलाके की सबसे घटिया इमारत थी हमारा हॉस्टल।
मैं और नितिन साथ रहने लगे थे। नितिन काफ़ी समझदार था अपने उम्र के हिसाब से, वो मुझसे अच्छे सवाल पूछता और काफ़ी इज्ज़त और प्यार से रहता था। उसे भी लिखने का शौक था और वो पढ़ाता था मुझे अपनी कविताएं, अच्छा लिखता था वो। मैं भी रोज़ लिखता था पर मेरे दिमाग में एक चीज़ घर कर गई थी के मैैं अपने घर से बहुत पैसे ले रहा हूं और मुझे कमाने पे ध्यान देना चाहिए। ऐसा नहीं था के मेरे पिताजी ने कुछ पैसे के बारे में बोला, जो था सिर्फ़ मेरे दिमाग़ में था। मैैं रात दिन सिर्फ़ पिताजी के बारे में सोचता के वो मेरी लिखाई से इतने खुश नहीं हैं और मैं उन्हें खुश करने के लिए कुछ करना चाहता था। पिताजी एक बैंकर थे और मेरा ध्यान भी वहीं गया, इंटरनेट पे बैंकिंग परीक्षा के बारे में पता किया और साथ ही साथ दिल्ली में एक कोचिंग भी ढूंढ ली। पिताजी को जब अपने इस नए फैसले के बारे में बताया तो वो दंग रह गए, खुश नहीं थे, क्यूंकि वो ये नहीं चाहते थे के मैं 22 साल की उम्र में नौकरी करू, वो चाहते थे मैं पोस्ट ग्रेजुएशन करू, जिसके मैं सख़्त विरोध में था। कॉलेज के बारे में सोचते हुए भी मैं परेशान हो जाता था, इच्छा नहीं थी के एक और डिग्री लें। मेरे दिमाग में पैसे और नौकरी घर कर गए थे। मैं भूल सा गया था के मुझे लिखना भी एक शौक है मेरा।
मेरी किसी बात पे पिताजी ना नहीं करते थे वो और मान गए, उन्होंने बस इतना बोला के जो कर रहे मन लगा के करना। मैंने राजीव चौक पे बैंकिंग की एक कोचिंग शुरू कर दी, इसके लिए भी घर से 7000 रुपए लेने पड़े और वो भी एक परेशानी का सबब था मेरे लिए, पर दिल्ली शहर में कहा कुछ मुफ़्त का था, यहां तो जिसके पास था बहुत था और जिसके पास नहीं था उसके पास कुछ नहीं था और वैसे भी मिडिल क्लास हमेशा से अलग रहे हैं, ना पूरे तरह से संपन्न और ना पूरे तरह से गरीब।
कोचिंग रोज़ दोपहर की 1 से शाम 5 तक होती थी,में हर रोज़ अपने हॉस्टल से आई. एन. ए. मेट्रो स्टेशन जाता था। रास्ते उतने अच्छे नहीं थे और आस पास कारखाने थे, रास्तों पे धूल उड़ती थी और वो मई की चिलचिलाती धूप, पर जैसे ही स्टेशन के अंदर पहुंचता, जोर जोर से ठंडी हवाएं चलती थी और खूब सारे कबूतर सबके अगल बगल से उड़ कर निकलते थ। ये कबूतर और इनकी ये रफ़्तार मेरे अंदर के कवि को टटोलते थे। शुरू शुरु में एक उत्साह था रोज़ क्लास जाने का और पढ़ने का पर एक महीने बाद मुझे मेरी ज़िन्दगी एक रोबोट सी निर्जीव लगने लगी। एक दिन मैं आई एन ए जा रहा था और रिक्शा नहीं मिला, तापमान 43 डिग्री था, किसी तरह स्टेशन पहुंचा और भारी थकान की वजह से स्टेशन की सीढ़ियों पर बैठ गया। मैंने बाहर से एक फ्रेस्का मैंगो ड्रिंक ले ली थी और मैं वो पीने लगा। हमेशा की तरह आज भी वो ताज़ी ठंडी हवा चल रही थी और कबूतर मदमस्त हवाओं में लहरा रहे थे। अचानक से एक कबूतर मेरे बिल्कुल बगल में आ कर खड़ा हो गया, मैं थोड़ा हिचकिचाया, पर डरा नहीं और कोशिश करी के उसको भी ना डराऊं। मेंने ध्यान दिया के वो कबूतर मुझसे डर नहीं रहा है, वो वहीं बैठ गया। मेंने उसको लगातार ध्यान से देखने के बाद उसको सहलाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया और वो फ़िर भी नहीं उड़ा और ना ही डरा। भीड़ भी बहुत कम थी उस दोपहर को मेट्रो स्टेशन पर, और कुछ आते जाते लोगों ने भी वो दृश्य देखा और सबके चेहरे पे इक मुस्कान थी। मैं भूल सा गया था के मुझे कोचिंग जाना है, वो कबूतर वहां मेरे साथ आधे घंटे बैठा और जब बाहर से कबूतरों का एक झुंड आया तो वो मेरे बगल से उड़ निकला। इस पूरे वाक्ए ने मेरे अंदर के अधमरे कवि को जगा दिया। उस अंजाने कबूतर का मेरे से ना डरना, उसका मेरे स्नेह से ना घबराना, मैं अपनी थकान भूल चुका था, और मैंने उन हवाओं में वहीं बैठ कर अपनी एक नोटबुक निकली,और उसके पिछले पन्ने पे ये लाइने लिख डाली:
रास्ते
किसकी फ़िराक़ में आगे बढूं अब,
मंज़िल कई हैं,
रास्ते भी नए हैं,
शायद मुसाफ़िर होना ही तकदीर है,
निकल पड़ा हूं,
उसी भीड़ में,
शायद मुश्किलों की,
ये आख़िरी लकीर है।
ये लाइने और उस कबूतर ने मुझे मेरा सुकून और मेरी मुस्कान वापस दिला दी। वो ज़िन्दगी के 45 मिनट उस स्टेशन पे मेरी ज़िन्दगी के कुछ सबसे अच्छे वक़्त की याद हैं। अब आगे क्या होना था, निकल पड़े बस्ता उठा के मेट्रो की ओर, मैथ्स की क्लास छूट गई थी और अगली अंग्रेज़ी की थी। इतने पैसे दिए थे, बिना पढ़े थोड़े घर जा सकते थे।
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