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शायर ए ख्याल - कविताएं

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             शायर ए ख्याल एक शायर या एक लेखक किस तरह सोचता है? ऐसा क्या होता है उसके पास के वो किसी भी चीज़ से प्रभावित होता है और उसको एक अलग अंदाज़ में कागज़ पे उतार देता है? इसे मैं ऊपरवाले की मेहरबानी मानता हूं के उसने मुझे ये कला बख्शी और इस काबिल बनाया के मैं अपने ज़हन के अंदर जा कर हर बार कुछ नया निकाल ले आऊं। ज़िन्दगी में एक एहसास ही काफ़ी होता है कुछ कर जाने के लिए। मैैं भी अकेलेपन के गहने दश्त में कई रोज़ गुमनाम रहा तब मैंने इस कला को अपने अंदर से ढूंढ़ा। वो मेरी पहली कविता भी रात्रि के उस अंधकार में निकली जब नींद का मैं गुलाम ना था। मुझे मेरे सपने भी एक कविता की तरह दिखते थे। अपने सपनों और उसमे पैदा होती व्यथाओं पर भी एक कविता लिखी थी -                     सपने        ये उतावले सपने,        ये ही मेरे अपने,      ...

शायर ए ख्याल - कविताएं

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             शायर ए ख्याल एक शायर या एक लेखक किस तरह सोचता है? ऐसा क्या होता है उसके पास के वो किसी भी चीज़ से प्रभावित होता है और उसको एक अलग अंदाज़ में कागज़ पे उतार देता है? इसे मैं ऊपरवाले की मेहरबानी मानता हूं के उसने मुझे ये कला बख्शी और इस काबिल बनाया के मैं अपने ज़हन के अंदर जा कर हर बार कुछ नया निकाल ले आऊं। ज़िन्दगी में एक एहसास ही काफ़ी होता है कुछ कर जाने के लिए। मैैं भी अकेलेपन के गहने दश्त में कई रोज़ गुमनाम रहा तब मैंने इस कला को अपने अंदर से ढूंढ़ा। वो मेरी पहली कविता भी रात्रि के उस अंधकार में निकली जब नींद का मैं गुलाम ना था। मुझे मेरे सपने भी एक कविता की तरह दिखते थे। अपने सपनों और उसमे पैदा होती व्यथाओं पर भी एक कविता लिखी थी -                     सपने        ये उतावले सपने,        ये ही मेरे अपने,      ...

कोरोना- एक ठहराव

कोरोना वायरस से आज पूरी दुनिया वाक़िफ है, और क्यों ना हो, देखते ही देखते कई लाख लोग इससे ग्रसित हो चुके हैं और कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। भारत भी हर सशक्त देश की तरह इस महामारी से जूझ रहा है, पर हमारे यहां चीज़ें ज़रा अलग होती है, इसमें शायद किसी को कोई संदेह नहीं होगा। हमारे यहां इसको ठीक करने के नुस्खे निकलते है, कई नए बाबा झाड़-फूंक कर इसको ठीक करने का दावा करते है तो कोई सजदे पढ़ कर इन्हें ठीक करने की सलाह देते हैं।पर यहां ना दुआ काम आ रही है और दवा नाम की तो कोई चीज़ है ही नहीं इसकी।  ना तो मैं ये लेख कोई नुस्खा बताने को लिख रहा ना ही किसी को सांत्वना प्रदान करने के लिए। मेरे विचार में ये नियति द्वारा लाया गया एक ठहराव है, अब आप में से कुछ लोग नियति को अगर चीन की वो लैब समझ लें तो भाई वो आपकी तार्किक शक्ति का प्रमाण होगा। मैं इसे ठहराव इसलिए बोल रहा हूं, क्योंकि ये इस आधुनिकीकरण से ग्रसित इस संसार में एक वरदान और एक अभिशाप बन कर आया है। इस अनचाहे मेहमान ने सबको अपने घरों में कैद कर दिया है, चाहे वो अंबानी साहब होएं या फ़िर एक बंधुआ मजदूर। कुछ ही लोग हैं जो इस महामारी ...

कविता - शहर

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क्या होता है जब आप अपने अरमानों के लिए, अपने सपनों के लिए अपने शहर से दूसरे शहर जाते है? हम कुछ दिन तो ज़रूर खुश रहते है, वो नए शहर की महक से, उसकी धूप से, उसकी गलियों से, उसके हर रूप से पर आखिरकार एक रात आप जब अकेले सोच रहे होते है तो आपको अपना घर याद आता है, अपने मां बाप याद आते है, अपना शहर याद आता है। ऐसे ही इक रोज़ मेरे दोस्त ' आशिक' का मुझे फोन आया, वो बहुत उम्दा गायक है, मेरे घनिष्ठ मित्रों में से एक है और वो भी मेरी तरह दिल्ली शहर में एक परीक्षा की तैयारी के लिए आया था पर उस फोन कॉल पे वो काफ़ी परेशान था और मुझसे कहता है, "यार रितेश, कुछ अच्छा नहीं लग रहा है इस शहर में, कुछ लिखो इसपे, एक गाना बनाएंगे हम" मैंने उनसे पूछा के उनको क्या महसूस हो रहा है और सब जानने के बाद अपनी ये कविता जिसका नाम "शहर" है लिखी।                  शहर  इस शहर से ना मैं वाबस्ता,  कहां ले जा रहा है ये रास्ता,  यहां नींद की तंगी,  इंसान बड़े जंगी,  ईमान ना है यहां सस्ता,  कहां ले जा रहा है ये रास्ता।  जुनून की यहां...